ख़री बात…

देखिये मैं ख़री ख़री कहता हूँ, इसीलिये आपको अखरता हूँ.. बातें तो मैं वो भी कर लूँ, जिनसे आपमें घुलता-मिलता हूँ.. पर फिर मैं कैसे सदाकत की बात कहता रहूँ? ख़ैर जाने दीजिए इन बातों को अभी, कभी और करेंगे.. आज तो ये बता दूँ के मैं आपसे ज़रा संभल कर के रहता हूँ.. अपने …

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कुछ नहीं था…

  आरज़ूएँ तो ढ़ेरों थीं, मग़र उनकी अदला- बदली में कुछ नहीं था... दौलत तो बेशुमार थी, मग़र उससे लेना-देना कुछ नहीं था.. ख़्वाब तो बहुत थे, मग़र उन ख़्वाबों में आने को ख़ास कुछ नहीं था.. अरमान तो बहुत थे, मग़र उनमें दम निकाल देने वाला कुछ नहीं था.. बेहतरीन थीं वो बातें, मग़र …

भ्रम..

किससे कहें के हमें कोई भ्रम नहीं, जिससे कहना है, वो भी तो भ्रम से कम नहीं.. इसकी भी कहीं कहानी शुरू हुई थी, एक वहमी सी जुगलबंदी मिली थी.. होड़ लगी दिखावे की, चेहरे नहीं मिले, मैनें मुखौटे देखे थे.. कहाँ गए वो मुखौटे ज़ालिम, जिन मुखौटों में चेहरे छिपे थे !! हर दरवाज़े …

तड़पती रही वो रात..

हमारी फ़िक्र से तुम नादाँ ना वाक़िफ़ रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात हम सँभलते रहे ! हम तुम्हारे रहे, तुम पर ठहरे रहे... वो मामला कुछ और रहा जबके हम, दो जिस्मों की एक रूह रहे... मौजूद तो रही जान बदन में जानेमन, हम मग़र बेजान रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात …

हुज़ूर-ए-आला..

बेअदब है इरादा जनाब का, मुड़-मुड़ कर देखते हैं हुज़ूर-ए-आला, उलझन है हमें... ये इश्क़ की साज़िश है के मोहब्बत का क़ायदा? हिचकोले खाती, डोलती, झूमती ये नदियाँ.. मेरी कश्ती में ना साहिल है, ना किनारा.. जाने कहाँ डूब जाए.. ये पानी की गहराई है के लहरों की अठखेलियाँ... हुज़ूर-ए-आला, उलझन है हमें... ये इश्क़ …

क़द..

क़द छोटा रह गया सपनों की उडानों से, पर जद्दो- जहद ज़ारी है… ज़िंदगी तू भी कब तक मुझ पर भारी है? चल देख़ें तेरा भी कुछ क़माल, आ करें दो-दो हाथ.. तूने बहुत की तैयारी है, आ भी जा अब फिर मेरी बारी है तुझसे उम्मीदें रखी, ये बडी मेरी नादानी है तूने भी …

तेरा शुक्रिया..

बेबाकी किसी को रास ना आई तेरी, नज़रें झुका कर चलना तेरा हरेक को अजीज़ हुआ करता है.. तूने भले ही आज के दौर में साँसें ली हों, पर जीना तेरा अब भी बहुतों को गवारा नहीं हुआ करता है.. हर कदम पर संघर्ष पाया है, फिर भी तूने साहस दिखाया है, तुझे ना आज …

बेटी हूँ मैं..

मुझे मेरी जड़ों से जुदा मत करो, वरना हर उखड़े पौधे सी मैं भी मुरझा जाऊँगी.. अस्तित्व को अपनें ख़ोकर ना उसने किसी को कुछ दिया ना वो किसी को याद आया। मुझे मेरी पहचान से जुदा मत करो, वरना हर फटे पन्ने सी मैं भी तहस-नहस हो जाऊँगी.. लिखे हर अक्षर को फाड़ कर …

चिड़िया …

कभी इस डाल, कभी उस डाल पर रहती है, चिड़ियों का आशियाना आलिशान नहीं होता.. होता है तो अपना हौसला कितनी निश्छल होती है, सबको  ख़ुद  सा समझती है.. जानती है के ये उजाड़ ही देगी एक दिन, फिर भी अपना घोंसला बेदर्दों के बीच बनाती है.. वो मस्त जीती हैं, अपनी उड़ान, अपने विश्वास …

राजनीति

देश के दिल को इस क़दर खा रही, जैसे राजनीति दावत मना रही.. भाषाओं के भी धर्म बता रही, देखो राजनीति बँटवारे करवा रही.. आँखों पर कंबल ढ़के सो रही, कानों के पट बंद किये बोल रही, ये राजनीति अँधी - बहरी हो गई.. राष्ट्र का सौदा कर इसे आपसी समझौता बता रही, ये राजनीति …