औक़ात…

कपड़ा नहीं तो ना सही, रोटी नहीं तो कोई बात नहीं... मग़र सोचो नहीं के उनकी कोई औक़ात नहीं... ये देखो ज़रा औक़ात अपनी, कर लो तुलना उनसे अपनी.. दिल तो बड़ा उन्हीं का है जी, कारण कष्ट है जो उन्होंने सहा वही.. घर हैं मग़र चैन की नींद नहीं नसीब तुम्हें, आसमान से सूकून …

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इश्क़ किया नहीं यूँ ही मैंने…

चाहा था जिसे अपने लिये, जो हमने गुज़ारा था, लम्हा मेरा, हर वो तुम्हारा था... इश्क़ किया नही यूँ ही मैंने, हाल-ए-दिल मेहरबान भी था... तू फ़साना मोहब्बत का, तू तराना धड़कन का... तू नूर है, मैं शमा सी जल जाऊँ... तू स्याही पिया, मैं रंग- रंग जाऊँ... तू चँदा, तुझसे रोशन घर रात का... …

तुमसे मिलूँगी….

मैं तुमसे कहीं फिर मिलूँगी... जाने कब और कहाँ मिलूँगी, याद करना मुझे जहाँ हो, शायद इंतज़ार में वहीं मिलूँगी... जा रही हूँ मैं जाने दो, मुझे यूँ प्यार से ना रोको... दीवाने हो ना जाना देखो, ज़िद्द को दिल की मना के रक्खो... वरना मैं तुमसे नहीं मिलूँगी!! कहते हो इश्क़ करते हो, ज़रा …

हम बौने ही अच्छे भईया…

हम नहीं कर पाएँगे दिखावा, ओ भईया! हम नहीं बन पाएँगे खजूर सी ऊँची छँईया... ले जाओ ये सामान अपना खजूर उगाने का, हम नहीं मचा पाएँगे ये बेबुनियादी हल्ला... लगता तो होगा गिरगिट सा तुम्हें हर बदन, मेरा भी, पर तुम्हें ही मुब़ारक ये नज़र का पतन, तेरा ही... चाहो तो ले आना संदेसा …

नई द्रौपदी…

उस दिन जब मैं रोई थी, पूरी रात नहीं सोई थी.. दर्द नहीं था ये किसी की जुदाई का, मैं तो दर्द देखकर 'नई द्रौपदी' का रोई थी... इस बार यह कौरवों की आखेट नहीं है.. यहां महाभारत का कोई रण-नाद नहीं है.. द्रौपदी इस बार तेज़ाब से जल रही है.. परन्तु यह 'नया महाभारत' …

कवि हूँ…

आभासों और भावनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संभावनाओं से भरा हूँ... दुख और व्यथाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, अत्याचारों से भरा हूँ... वेदना और अवहेलनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संवेदनाओं से भरा हूँ... हँसी और हास्य से भरा हूँ, कवि हूँ, मुस्कानों से भरा हूँ... शब्दों और परिभाषाओं से भरा हूँ, कवि …

बदलाव चाहिए….

समाज लोगों ने बनाया, लोगों को रास ना आया.. उसे बदलने कोई आगे ना आया, प्रथाएँ इसकी अपना कर चल दिया.. ज़माना सारा दोष 'समाज' पर मढ कर चल दिया। समाज को बदलाव चाहिए, ख़ुले विचारों वाले सरताज चाहिए.. कुरीतियाँ कितनी चली जाती हैं, इन्हें बुलंद आवाज़ वाला कोई शोर चाहिए.. हर दिन जाने कितनें …

ये वो नहीं, ये ज़िन्दगी कुछ और है…

ये वो शमा नहीं जो परवानों को जलाया करती है, ये वो शाम है जो आफ़ताब को जला जाया करती है... ये वो चाँदनी नहीं जो महताब को सताया करती है, ये वो स्याही है जो सितारों को रंग जाया करती है... ये वो रूख़सार नहीं जो मुस्कान को किनारे दिया करते हैं, ये वो …

कवि …

वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? कविताएँ तो बन गईं स्वतः ही, परन्तु कवित्व किसने जाया? शब्दों की माला पिरोई, रचनाओं को किसने सजाया? मन के भावों को भाषा दी, कल्पनाओं का ताना बाना बनाया.. वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? शायद वह वैरागी था कोई, जिसने फ़कीरी को प्रेम बनाया... …

नाता…

एक अजीब सी कश्मकश मचलती है मुझमें, कोई पुरानी दिल्लगी रह गई होगी.. कभी किसी परिंदे से जुड़ जाती हूँ, कभी चींटी से, कभी तितली से तो कभी किसी गिलहरी से, यहीं किसी की मेज़बानी रह गई होगी.. मुझे तो रत्ती भर अंदाज़ा नहीं इस मीठी चुभन का, शायद किसी से कभी कोई मुलाक़ात बाकी …