कोई मोल ना रहा उनके दर्द का, यूँ के वो रिश्तेदारों से अपना दर्द कहते थे... दर्द तो सहते थे मग़र, उन्हें जाने क्यूँ वो अपना हमदर्द कहते थे... हमदर्द कभी दिल नहीं दुखाते, उनके मग़र कुछ अलग थे... ये दिल टटोलते भी थे, दुखाते भी थे और तोड़ते भी थे सुनते भी थे बड़ी …
एक उमंग…
एक रात काली, बहुत काली थी फिर भी एक सपने की शमा जगमगाती रही... अंधेरे में कहीं खो गया वो जुगनू चलते-चलते, एक लौ मग़र अंदर उसके झिलमिलाती रही... एक ओर समंदर का तूफ़ान बेचैन था, एक ओर मिट्टी की प्यास उफ़नती रही... उजड़ा हुआ एक आसमाँ सहमा पड़ा था, एक बंजर ज़मीं फ़र्ज़ निभाती …

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