मैं हर वो औरत हूँ..

अपनें जज़्बातों को दबाए रखना पड़ता था, अपनी आवाज़ को बंद रख़ना पड़ता था.. मेरे मन की सुनने वाला कोई नहीं था, सबके मन का मग़र मुझे करना पड़ता था.. मुझे क्या चोट पहुँचाता गया इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था, हर एक की चोट पर मरहम करना मग़र मेरा कर्तव्य बताया गया.. जब जब मैनें …