मैं हर वो औरत हूँ..

अपनें जज़्बातों को दबाए रखना पड़ता था, अपनी आवाज़ को बंद रख़ना पड़ता था.. मेरे मन की सुनने वाला कोई नहीं था, सबके मन का मग़र मुझे करना पड़ता था.. मुझे क्या चोट पहुँचाता गया इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था, हर एक की चोट पर मरहम करना मग़र मेरा कर्तव्य बताया गया.. जब जब मैनें …

मर्ज़ियाँ …

मुझसे मोहब्बत की, फिर मुझे छोड गये.. क़ाफिर हो गया हो जैसे कोई, इबादत करते करते ! रास्ते में दिल बिछा दिया मैंने, ये सोचकर.. मुसाफिर लैटता होगा मेरा थक हार कर! मुद्दतों बाद आज ये तमन्ना हुई.. तुझे छू कर देखूँ, तेरा इश्क़ वही तो नहीं? ऐसी मर्ज़ियाँ मुझे ही चोर कहने लग़ती हैं, …