कितना बेफ़िक़्र ये बचपन होता है, कोई बंदिशें ना कोई खोट होता है.. होती हैं जो हमसे वो प्यारी सी खतायें, कैसे बड़ी जल्दी सब माफ़ होता है.. शायद सब को हमारी उन हरकतों से बस तभी प्यार होता है, माना बचपन में बड़ा होना एक ख्वाब होता है, पर लगता है सिर्फ बचपन में …
बेबस बेटी
कल देखा उसे गली के नुक्कड़ पर बनी अपनी कोटड़ी से बाहर बैठे हँसते हुए, किसी से बातें करते, शायद भाई था उसका। उतना खुलकर हँसना तो बेशक हमें भी नहीं आता जैसे उसकी हँसी ख़िलख़िला रही थी, सच ही तो कहते हैं ख़ुशियाँ खुले बाज़ारों से ज़्यादा इस खुले आसमान के नीचे मिलती हैं.. फ्लैट्स …

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