हमारी फ़िक्र से तुम नादाँ ना वाक़िफ़ रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात हम सँभलते रहे ! हम तुम्हारे रहे, तुम पर ठहरे रहे... वो मामला कुछ और रहा जबके हम, दो जिस्मों की एक रूह रहे... मौजूद तो रही जान बदन में जानेमन, हम मग़र बेजान रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात …
हुज़ूर-ए-आला..
बेअदब है इरादा जनाब का, मुड़-मुड़ कर देखते हैं हुज़ूर-ए-आला, उलझन है हमें... ये इश्क़ की साज़िश है के मोहब्बत का क़ायदा? हिचकोले खाती, डोलती, झूमती ये नदियाँ.. मेरी कश्ती में ना साहिल है, ना किनारा.. जाने कहाँ डूब जाए.. ये पानी की गहराई है के लहरों की अठखेलियाँ... हुज़ूर-ए-आला, उलझन है हमें... ये इश्क़ …

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