ये वो नहीं, ये ज़िन्दगी कुछ और है…

ये वो शमा नहीं जो परवानों को जलाया करती है, ये वो शाम है जो आफ़ताब को जला जाया करती है... ये वो चाँदनी नहीं जो महताब को सताया करती है, ये वो स्याही है जो सितारों को रंग जाया करती है... ये वो रूख़सार नहीं जो मुस्कान को किनारे दिया करते हैं, ये वो …

कवि …

वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? कविताएँ तो बन गईं स्वतः ही, परन्तु कवित्व किसने जाया? शब्दों की माला पिरोई, रचनाओं को किसने सजाया? मन के भावों को भाषा दी, कल्पनाओं का ताना बाना बनाया.. वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? शायद वह वैरागी था कोई, जिसने फ़कीरी को प्रेम बनाया... …