आभासों और भावनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संभावनाओं से भरा हूँ... दुख और व्यथाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, अत्याचारों से भरा हूँ... वेदना और अवहेलनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संवेदनाओं से भरा हूँ... हँसी और हास्य से भरा हूँ, कवि हूँ, मुस्कानों से भरा हूँ... शब्दों और परिभाषाओं से भरा हूँ, कवि …
बदलाव चाहिए….
समाज लोगों ने बनाया, लोगों को रास ना आया.. उसे बदलने कोई आगे ना आया, प्रथाएँ इसकी अपना कर चल दिया.. ज़माना सारा दोष 'समाज' पर मढ कर चल दिया। समाज को बदलाव चाहिए, ख़ुले विचारों वाले सरताज चाहिए.. कुरीतियाँ कितनी चली जाती हैं, इन्हें बुलंद आवाज़ वाला कोई शोर चाहिए.. हर दिन जाने कितनें …

You must be logged in to post a comment.