मजबूरी को नियति का नाम ना दे…

मजबूरी को नियति का नाम ना दे, अपनेआप को बेचारगी का फ़रमान ना दे... क़िस्मत में क्या है क्या नहीं, इसका फैसला क़िस्मत के हाथ ना दे... ख़ुद बढ़कर लिख अपना अफ़साना तू, कह दे क़िस्मत से आकर अपना इनाम ले !! माना हाथ बड़े हैं समय के, मग़र समय के हाथों में अपना हाथ …

औक़ात…

कपड़ा नहीं तो ना सही, रोटी नहीं तो कोई बात नहीं... मग़र सोचो नहीं के उनकी कोई औक़ात नहीं... ये देखो ज़रा औक़ात अपनी, कर लो तुलना उनसे अपनी.. दिल तो बड़ा उन्हीं का है जी, कारण कष्ट है जो उन्होंने सहा वही.. घर हैं मग़र चैन की नींद नहीं नसीब तुम्हें, आसमान से सूकून …