किससे कहें के हमें कोई भ्रम नहीं, जिससे कहना है, वो भी तो भ्रम से कम नहीं.. इसकी भी कहीं कहानी शुरू हुई थी, एक वहमी सी जुगलबंदी मिली थी.. होड़ लगी दिखावे की, चेहरे नहीं मिले, मैनें मुखौटे देखे थे.. कहाँ गए वो मुखौटे ज़ालिम, जिन मुखौटों में चेहरे छिपे थे !! हर दरवाज़े …
तड़पती रही वो रात..
हमारी फ़िक्र से तुम नादाँ ना वाक़िफ़ रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात हम सँभलते रहे ! हम तुम्हारे रहे, तुम पर ठहरे रहे... वो मामला कुछ और रहा जबके हम, दो जिस्मों की एक रूह रहे... मौजूद तो रही जान बदन में जानेमन, हम मग़र बेजान रहे... तड़पती रही वो रात, हर रात …

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