वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? कविताएँ तो बन गईं स्वतः ही, परन्तु कवित्व किसने जाया? शब्दों की माला पिरोई, रचनाओं को किसने सजाया? मन के भावों को भाषा दी, कल्पनाओं का ताना बाना बनाया.. वो सृजन कहाँ से आया, जिसने कवि बनाया? शायद वह वैरागी था कोई, जिसने फ़कीरी को प्रेम बनाया... …
नाता…
एक अजीब सी कश्मकश मचलती है मुझमें, कोई पुरानी दिल्लगी रह गई होगी.. कभी किसी परिंदे से जुड़ जाती हूँ, कभी चींटी से, कभी तितली से तो कभी किसी गिलहरी से, यहीं किसी की मेज़बानी रह गई होगी.. मुझे तो रत्ती भर अंदाज़ा नहीं इस मीठी चुभन का, शायद किसी से कभी कोई मुलाक़ात बाकी …

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