समाज लोगों ने बनाया, लोगों को रास ना आया.. उसे बदलने कोई आगे ना आया, प्रथाएँ इसकी अपना कर चल दिया.. ज़माना सारा दोष 'समाज' पर मढ कर चल दिया। समाज को बदलाव चाहिए, ख़ुले विचारों वाले सरताज चाहिए.. कुरीतियाँ कितनी चली जाती हैं, इन्हें बुलंद आवाज़ वाला कोई शोर चाहिए.. हर दिन जाने कितनें …
ये वो नहीं, ये ज़िन्दगी कुछ और है…
ये वो शमा नहीं जो परवानों को जलाया करती है, ये वो शाम है जो आफ़ताब को जला जाया करती है... ये वो चाँदनी नहीं जो महताब को सताया करती है, ये वो स्याही है जो सितारों को रंग जाया करती है... ये वो रूख़सार नहीं जो मुस्कान को किनारे दिया करते हैं, ये वो …

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