नई द्रौपदी…

उस दिन जब मैं रोई थी, पूरी रात नहीं सोई थी.. दर्द नहीं था ये किसी की जुदाई का, मैं तो दर्द देखकर 'नई द्रौपदी' का रोई थी... इस बार यह कौरवों की आखेट नहीं है.. यहां महाभारत का कोई रण-नाद नहीं है.. द्रौपदी इस बार तेज़ाब से जल रही है.. परन्तु यह 'नया महाभारत' …

कवि हूँ…

आभासों और भावनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संभावनाओं से भरा हूँ... दुख और व्यथाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, अत्याचारों से भरा हूँ... वेदना और अवहेलनाओं से भरा हूँ, कवि हूँ, संवेदनाओं से भरा हूँ... हँसी और हास्य से भरा हूँ, कवि हूँ, मुस्कानों से भरा हूँ... शब्दों और परिभाषाओं से भरा हूँ, कवि …