चिड़िया …

कभी इस डाल, कभी उस डाल पर रहती है, चिड़ियों का आशियाना आलिशान नहीं होता.. होता है तो अपना हौसला कितनी निश्छल होती है, सबको  ख़ुद  सा समझती है.. जानती है के ये उजाड़ ही देगी एक दिन, फिर भी अपना घोंसला बेदर्दों के बीच बनाती है.. वो मस्त जीती हैं, अपनी उड़ान, अपने विश्वास …

राजनीति

देश के दिल को इस क़दर खा रही, जैसे राजनीति दावत मना रही.. भाषाओं के भी धर्म बता रही, देखो राजनीति बँटवारे करवा रही.. आँखों पर कंबल ढ़के सो रही, कानों के पट बंद किये बोल रही, ये राजनीति अँधी - बहरी हो गई.. राष्ट्र का सौदा कर इसे आपसी समझौता बता रही, ये राजनीति …