आरज़ूएँ तो ढ़ेरों थीं, मग़र उनकी अदला- बदली में कुछ नहीं था... दौलत तो बेशुमार थी, मग़र उससे लेना-देना कुछ नहीं था.. ख़्वाब तो बहुत थे, मग़र उन ख़्वाबों में आने को ख़ास कुछ नहीं था.. अरमान तो बहुत थे, मग़र उनमें दम निकाल देने वाला कुछ नहीं था.. बेहतरीन थीं वो बातें, मग़र …
भ्रम..
किससे कहें के हमें कोई भ्रम नहीं, जिससे कहना है, वो भी तो भ्रम से कम नहीं.. इसकी भी कहीं कहानी शुरू हुई थी, एक वहमी सी जुगलबंदी मिली थी.. होड़ लगी दिखावे की, चेहरे नहीं मिले, मैनें मुखौटे देखे थे.. कहाँ गए वो मुखौटे ज़ालिम, जिन मुखौटों में चेहरे छिपे थे !! हर दरवाज़े …

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