एक अजीब सी कश्मकश मचलती है मुझमें, कोई पुरानी दिल्लगी रह गई होगी.. कभी किसी परिंदे से जुड़ जाती हूँ, कभी चींटी से, कभी तितली से तो कभी किसी गिलहरी से, यहीं किसी की मेज़बानी रह गई होगी.. मुझे तो रत्ती भर अंदाज़ा नहीं इस मीठी चुभन का, शायद किसी से कभी कोई मुलाक़ात बाकी …
ख़री बात…
देखिये मैं ख़री ख़री कहता हूँ, इसीलिये आपको अखरता हूँ.. बातें तो मैं वो भी कर लूँ, जिनसे आपमें घुलता-मिलता हूँ.. पर फिर मैं कैसे सदाकत की बात कहता रहूँ? ख़ैर जाने दीजिए इन बातों को अभी, कभी और करेंगे.. आज तो ये बता दूँ के मैं आपसे ज़रा संभल कर के रहता हूँ.. अपने …

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